Tuesday, 18 July 2017

Homemade Juice for Burning Abdominal Fat

There are numerous of recipes for losing extra weight and improving our health, but they not always work. Here we are going to give you the best recipe for a homemade juice which has amazing benefits for our body and one of them is burning the abdominal fat.

It is easy for preparing and every one of us can make it in our homes.

Ingredients you will need:

1 unit cucumber
3 pieces of pineapple
A steam o celery
A glass of parsley leaves

Preparation:

Cut the cucumber in circles and the celery and parsley into small pieces. Add them in a blender and blend them well till you get a homogeneous  mixture.

Use:

You should drink this juice every morning on an empty stomach. After a short period you will see the results. You will lose your extra pounds and also improve your health.

Another recipe which can help you burn your abdominal fat

Ingredients you will need for preparing the remedy:

2 grapefruits
1 tablespoon grated ginger
1 tablespoon apple cider vinegar

Preparation:

Put the ingredients in a juicer and mix it well. Drink it 30 minutes before you go to sleep for a period of 7 days and then have a break of 7 days. Repeat this till you get the wanted results.

If you are one of the millions of people with overweight problems you should try these juices and see the improvements. During the this period you should exercise regular minimum 30 minutes a day and also try to avoid food as: white bread, sugary drinks, candy bars, alcohol, fast food, and milk products. The results will be unbelievable. Don’t think twice make a change in your diet and get the body you always wanted.

प्याज खाने और काटने के होते है ये फायदें

कच्चा प्याज काटते समय अक्सर आप सभी की आंखों में आंसु आ जाते होंगे। लोग प्याज खाना तो पंसद करते लेकिन काटना पंसद नहीं करते। लेकिन क्या आप जानते है कि कच्चा प्याज काटने और खाने के बहुत से फायदें है। यदि आप सब ये सारे फायदे जान जाएंगे तो प्याज रोज खाना शूरू कर देंगे। वैसे तो प्याज काफी गुणकारी है, लेकिन पकने के बाद प्याज के पैष्टिक तत्व खत्म हो जाते है, इसलिए बेहतर होगा की आप प्याज को कच्चा ही खाए। तो आइए जानते है प्याज खाने के फायदें-


  • प्याज में सल्फर युक्त तत्वों की काफी मात्रा होती है. इस वदह से ही प्याज में तीव्र सुगंध औषधीय गुण होता है.
  • -प्याज में विटामिन सी, विटामिन बी6, बायोटिन, फोलिक एसिड, क्रोमियम और फाइबर प्रचूर मात्रा में पाया जाता है।
  • -प्याज कॉलेस्ट्रोल और ट्राइग्लेसराइड्स को कम करती है। प्याज में मौजूद सल्फर फ्राकृतिक रूप से खून को पतला करने और पलेटलेट्स के जमावड़े को रोकने के लिए जाना जाता है। वहीं प्याज में मौजूद क्यीरसटिन धमनियों को सख्त होने से बचाता है और इस तरह से हार्ट अटैक के खतरे को कम करता है।
  • -प्याज में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण श्वास नली की मांसपेशियों को रिलैक्स करके अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसे रोगो में अराम पहुंचाते हैं। प्याज खांसी, जुकाम और फिलू जैसे रोगो से भी हमारी रक्षा करती है।
इसे भी पढ़ें-हैंगोवर को उतारने के लिए आजमाएं ये आसान से तरीकें

  • प्याज में मौजूद एंटीमाइक्रोबियल गुण हमें किटाणुओं से पैदा होने वाली खाद्य जनित रोगों से भी बचाते हैं।
  • -प्याज टीबी के लए जिम्मेदार बैक्टेरिया इकोबैकटेरियम को निष्क्रिय कर सकती है।
  • -स्तनपान करवा रहीं मां यदि कच्चा प्याज खाएं तो उनके स्तनों में दूध का उत्पादन बढ़ जाता है।
  • -कच्चे प्याज में एंटी ऑक्सीडेंट भी होते हैं।
  • -प्याज में एंटी कैंसर गुण भी पाए जाते हैं।
  • -कच्चा प्याज खाने से पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं दूर होती हैं।
  • -प्याज में प्रचूर मात्रा में लोहा पाया जाता है। अगर एक कच्चा प्याज रोज खाया जाए तो अनेमिया की समस्या दूर हो जाती है।
  • -प्याज रक्त में शुगर की मात्र को नियंत्रित करती है।

Thursday, 25 May 2017

एक्ज़िमा और सोराइसिस के लिए रामबाण उपाय। (Panacea remedy for eczema and psoriasis)

कई ऐसे त्वचा रोग हैं, जो लंबे समय तक रोगी को परेशान करते हैं. कई बार लंबे समय तक इलाज के बावजूद ये ठीक नहीं होते हैं. ऐसे में रोगी निराश भी हो जाते हैं. सोरायसिस एक ऐसा ही रोग है, जो आॅटो इम्यून डिसआॅर्डर है. अगर सही तरीके से धैर्य रख कर इलाज कराया जाये, तो इस रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है. 
 
सोरायसिस क्रॉनिक यानी बार बार होनेवाला आॅटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के अनेक अंगो को प्रभावित करता है. यह मुख्य रूप से त्वचा पर दिखाई देता है, इसलिए इसे चर्म रोग ही समझा जाता है. यह किसी भी उम्र में हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में लगभग एक प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है पर अकसर 20-30 वर्ष की आयु में अधिक आरंभ होता है. 60 वर्ष की आयु के बाद इसके होने की आशंका अत्यंत कम होती है. 5-10 प्रतिशत रोगियों में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य को भी इस रोग से पीड़ित देखा गया है. आयुर्वेद में सोरायसिस को एक कुष्ठ, मंडल कुष्ठ या किटिभ कुष्ठ जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बोलचाल की भाषा में कुछ लोग इसे छाल रोग भी कहते हैं.
 
क्या हैं कारण 
 
शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की गड़बड़ी को इसका कारण माना जाता है. आयुर्वेद में विरुद्ध आहार या असंतुलित खान-पान के कारण पित्त और कफ दोषों में होनेवाली विकृति को इसका कारण बताया गया है. त्वचा की सबसे बाहरी परत (एपिडर्मिस) की अरबों कोशिकाएं प्रतिदिन झड़ कर नयी कोशिकाएं बनती हैं और एक महीने में पूरी नयी त्वचा का निर्माण हो जाता है. सोरायसिस में कोशिकाओं का निर्माण असामान्य रूप से तेज हो जाता है और नयी कोशिकाएं एक माह की जगह चार-पांच दिनों में बन कर मोटी चमकीली परत के रूप में दिखाई पड़ती हैं और आसानी से झड़ने लगती है. चोट लगने, संक्रामक रोग के बाद या अन्य दवाओं के कुप्रभाव के कारण भी सोरायसिस की शुरुआत होती है.
 
इस रोग के लक्षण 
 
सोरायसिस कोहनी, घुटनों, खोपड़ी, पीठ, पेट, हाथ, पांव की त्वचा पर अधिक होता है. शुरुआत में त्वचा पर रूखापन आ जाता है, लालिमा लिये छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. ये दाने मिल कर छोटे या फिर काफी बड़े चकत्तों का रूप ले लेते है. चकत्तों की त्वचा मोटी हो जाती है. 
 
हल्की या तेज खुजली होती है. खुजलाने से त्वचा से चमकीली पतली परत निकलती है. परत निकलने के बाद नीचे की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है और खून की छोटी बूंदे दिखाई पड़ सकती हैं. खोपड़ी की त्वचा प्रभावित होने पर यह कभी रूसी की तरह या अत्यधिक मोटी परत के रूप में दिखाई पड़ती है. नाखूनों के प्रभावित होने पर उनमें छोटे-छोटे गड्ढे हो सकते हैं. विकृत हो कर मोटे या टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं. नाखून पूरी तरह नष्ट भी हो सकते हैं. 
 
लगभग 20% सोरायसिस के पुराने रोगियों के जोड़ों में दर्द और सूजन भी हो जाती है, जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है. अधिकांश रोगियों में रोग के लक्षण ठंड के समय में बढ़ जाते हैं. पर कुछ रोगियों को गरमी के महीने में अधिक परेशानी होती है. तनाव, शराब के सेवन या धूम्रपान से भी लक्षण बढ़ जाते हैं. अधिक प्रोटीन युक्त भोजन जैसे-मांस, सोयाबीन, दालों के सेवन से भी रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है. यह छूत की बीमारी नहीं है.
 
जिद्दी त्वचा रोग है सोरायसिस
 
सोरायसिस एक आॅटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है. यह रोग काफी जिद्दी है और लंबे समय तक परेशान करता है. अगर धैर्य रख कर इसका उपचार सही तरीके से कराया जाये, तो इससे छुटकारा मिल सकता है. आयुर्वेद से इसके ठीक होने की संभावना अधिक होती है.
 
रोग के अनेक प्रकार
 
प्लाक सोरायसिस : लगभग 70-80 % रोगी प्लाक सोरायसिस से ही ग्रस्त होते हैं. इसमें कोहनियों, घुटनों, पीठ, कमर, पेट और खोपड़ी की त्वचा पर रक्तिम, छिलकेदार मोटे धब्बे या चकत्ते निकल आते हैं. इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है.
 
गट्टेट सोरायसिस : यह अकसर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर छोटे -छोटे लाल दानों के रूप में दिखाई पड़ता है. प्रभावित त्वचा प्लाक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है. अनेक रोगी स्वत: या इलाज से चार-छह हफ्तों में ठीक हो जाते हैं. पर कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में परिवर्तित हो सकते हैं
 
पामोप्लांटर सोरायसिस : यह मुख्य रूप से हथेलियों और तलवों को प्रभावित करता है. 
पुस्चुलर सोरायसिस: इस प्रकार में अकसर हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लालिमा से घिरे दानों में मवाद हो जाता है. 
एरिथ्रोडार्मिक सोरायसिस : इस प्रकार के सोरायसिस में चेहरे समेत शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लालिमा लिये चकत्ते हो जाते हैं. शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है और समय पर उचित चिकित्सा नहीं होने पर रोगी के प्राण जा सकते हैं. 
 
इन्वर्स सोरायसिस : इसमे स्तनों के नीचे, बगल, कांख या जांघों के उपरी हिस्से में लाल बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं.
होमियोपैथी में उपचार
 
सोरायसिस इम्युनिटी में गड़बड़ी के कारण होता है, इसलिए इसका उपचार करने का सबसे अच्छा तरीका इम्युनिटी में सुधार करना ही है. अत: इम्युनिटी को सुधारने के लिए सोरिनम सीएम शक्ति की दवा चार बूंद महीने में एक बार लें. 
काली आर्च : अगर त्वचा से रूसी निकले, नोचने पर और अधिक निकले, रोग जोड़ों पर अधिक हो, तो काली आर्च 200 शक्ति की दवा चार बूंद रोज सुबह में दें.
 
पामर या प्लांटर सोरायसिस : अगर सोरायसिस हथेली या तलवों तक ही सीमित हो, तो इसके लिए सबसे अच्छी दवा फॉस्फोरस है. इसकी 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
 
काली सल्फ : सोरायसिस सिर में भी होता है. सिर की त्वचा से सफेद रंग की रूसी निकले और गोल-गोल चकत्ते जैसे हों, तो काली सल्फ 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
रोग को ठीक होने में लंबा समय लग सकता है. अत: धैर्य रख कर उपचार कराना जरूरी है.
(होमियोपैथी विशेषज्ञ डॉ एस चंद्रा से बातचीत)
 
सोरायसिस की चिकित्सा 
 
यह एक हठीला रोग है, जो अकसर पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. यदि एक बार हो गया, तो जीवन भर चल सकता है. अर्थात् रोग होता है, फिर ठीक भी होता है, लेकिन बाद में फिर हो जाता है. कुछ रोगियों में यह लगातार भी रह सकता है. हालांकि इसके कुछ रोगी अपने आप ठीक भी हो जाते हैं. 
 
क्यों ठीक होते हैं अभी तक कारण अज्ञात है. कुछ नये रोगी धैर्य से खान-पान परहेज के साथ जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन और सावधानियों के साथ दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं अथवा रोग के लक्षणों से लंबी अवधि के लिए मुक्ति मिल जाती है. रोग के प्रारंभ में ही यदि आयुर्वेद विज्ञान से उपचार कराया जाता है, तो उपचार से रोग के ठीक होने की अधिक संभावना है. पुराने रोगियों को भी तुलनात्मक दृष्टि से कम खर्च में काफी राहत मिल जाती है. और रोगी बगैर परेशानी के सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है. एलोपैथ चिकित्सा प्रणाली में कुछ वर्षों पहले तक इसकी संतोषजनक चिकित्सा नहीं थी. विगत एक दशक में कई प्रभावकारी दवाएं विकसित हुई हैं, जिनके प्रयोग से लंबे समय तक रोग के लक्षणों से राहत मिल जाती है. 
 
एलोपैथ चिकित्सा 
 
साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं. 
 
पुवा (पीयूवीए) थेरेपी : अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक  रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता.
 
बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है.
 
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं. 
 
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही लेनी चाहिए. रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है.                            
 
 
रोग होने पर क्या करें  
 
विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लें. एलोपैथ के साथ-साथ इस रोग में लाभकारी खानपान, जीवनशैली, आयुर्वेद तथा वनौषधियों के प्रयोग से इसमें लाभ मिलता है. नीम-हकीमों के और गारंटी से ठीक कर देनेवालों के चक्कर में अकसर धन और समय की हानि के साथ-साथ रोग की जटिलताएं बढ़ जाती हैं.
 
क्या है आॅटोइम्यून डिजीज
 
आहार, विहार तथा जीवनशैली में गड़बड़ी के साथ-साथ निरंतर बढ़ते कृत्रिम रसायनों के उपयोग, प्रदूषण जैसे ज्ञात तथा अनेक अज्ञात कारणों से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति (इम्युनिटी) अपने ही शरीर के अंगो को हानि पंहुचाने लगती है और विभिन्न रोगों का कारण बनती है. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि यदि पुलिस या सेना में विद्रोह हो जाये, तो वे नागरिक, समाज और देश की सुरक्षा के बजाय अपने ही नागरिकों और व्यवस्था के प्रति हिंसक हो जाते हैं. ठीक ऐसी ही घटना शरीर में भी होती है. इसी के कारण कोशिकाओं में तीव्र गति से वृद्धि होने लगती है.
 
कुछ आॅटोइम्यून बीमारियां : रुमेटॉयड आर्थराइटिस, सोरायसिस, हासिमोटो, थायरॉयड, ल्यूपस एरिदोमेटेसिस, स्क्लेरोडर्मा, अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रोह्नस डिजीज, विटिलिगो, एलोपेसिया एयार्टा आदि अनेक रोग इस श्रेणी में आते हैं. 
 
आयुर्वेद स्वास्थ्य विज्ञान में सोरायसिस की चिकित्सा के लिए अनेक औषधियों के विकल्प के साथ-साथ आहार-विहार, परहेज का विशेष ध्यान रखा जाता है. कभी-कभी शरीर में व्याप्त हानिकारक तत्वों को निकालने के लिए पंचकर्म नामक विशिष्ट चिकित्सा का प्रयोग काफी लाभ दायक होता है. उपयोगी जड़ी-बूटियां तथा आयुर्वेदिक दवाएं जैसे-घृतकुमारी, श्वेत कुटज, अमृता (गुडिच), नीम, करंज, मजीठ, सारिवा, खदिर, मंडुकपर्णी, कुटकी, नीम, हल्दी, कैशोर गुगलू, रस माणिक्य, महामंजिष्ठादी, पंचतिक्त घृत  
प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसी)  के सेवन के साथ इसके स्थानीय लेप से कई रोगियों को 70-80 प्रतिशत लाभ होने के अनुभव आये हैं.
 
विज्ञान सम्मत तथा परीक्षित उपयोगी घरेलू चिकित्सा
 
  • -नीम की पत्तियां या गुडिच के तने को पीस कर या उबाल कर सोरायसिस से प्रभावित अंग धोएं.
  • -घृतकुमारी (एलोवेरा) का ताजा गूदा त्वचा पर लगाएं या इस गूदे का प्रतिदिन दो-तीन चम्मच दिन में दो बार सेवन करें.
  • -प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसी) का सेवन करने से भी लाभ होता है.
  • -मांस, मुर्गा, अंडा, उड़द, मटर, सोयाबीन जैसे अधिक प्रोटीन युक्त भोजन न करें. 
  • -कपालभाति और अनुलोम-विलोम का नियमित अभ्यास भी रोग से राहत देने में उपयोगी है.
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Thursday, 4 May 2017

दोगुना लाभ पाने के लिए दही में मिलाकर खाएं ये 5 चीजें!

खाने के साथ दही ना हो तो खाने का मजा ही नहीं आता है। कई लोग हर रोज अपने खाने में दही का इस्तेमाल करते हैं। इस समय तो गर्मी का मौसम है। इस मौसम में दही का सेवन किसी अमृत के सेवन से कम नहीं माना जाता है। दही शरीर को ठंढक देने के साथ-साथ शक्ति भी प्रदान करती है। दही में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए काफी लाभदायक होते हैं।



दही का सेवन हर तरह से होता है फायदेमंद:

दही में गुड वैक्टीरिया, मिनरल्स, विटामिन और कैल्शियम मौजूद होता है। यह शरीर की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। वैसे तो दही का सेवन किसी भी तरह से किया जाए, फायदा ही पहुंचाता है, लेकिन अगर इसमें कुछ चीजें मिलाकर खाई जाएं तो इसका फायदा दोगना हो जाता है। आज हम आपको कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें दही में मिलाकर खाने से फायदा दोगना हो जाता है।


दही और भूना हुआ जीरा: 
अगर आपको भूख नहीं लगती है तो चिंता ना करें, बल्कि दही खाते समय उसमें काला नमक और भूना हुआ जीरा मिलाकर खाएं। ऐसा करने से आपकी भूख बढ़ती है, साथ ही पाचन क्रिया भी अच्छी रहती है।


दही और शहद: 
दही और शहद का एक साथ सेवन अमृत जैसा होता है। यह कई तरह से शरीर को फायदा पहुंचाता है। यह एक एंटीबायोटिक की तरह काम करता है। दही में शहद मिलाकर खाने से मुंह का अल्सर भी ठीक हो जाता है।






दही और काली मिर्च: 
अगर आप मोटे हैं और पतला होना चाहते हैं तो आपको कुछ और करने की जरूरत नहीं है। आप दही खाते वक्त उसमें काला नमक और काली मिर्च का पाउडर मिलाकर खाएं। ऐसा करने से शरीर का एक्स्ट्रा फैट बर्न होता है।






दही और सूखे मेवे: 

दही में सूखे मेवे और चीनी मिलाकर खाने से शरीर की कमजोरी दूर होती है। अगर आप बहुत  -पतले हैं तो इसका सेवन लगातार करें, जल्दी ही आपकी सेहत सुधर जायेगी।







दही और अजवाइन : 


अगर आप काफी समय से पाइल्स से परेशान है तो अब इससे छुटकारा पाने का वक्त आ गया है। आप दही में आजवाइन मिलाकर खाएं, कुछ ही दिनों में आपकी ये समस्या हमेशा के लिए दूर हो जायेगी।

बाल कभी नहीं सफ़ेद होंगे. ये आयुर्वेदिक बीज बुढ़ापे तक बालों को घना और काला रखते है

चिरमिटी/रत्ती/घुंघुचि/गुंचा (Abrus Precatorius)

  • हम बात कर रहे है ऐसे चमत्कारी बिज जिनको गुंचा या चिरमिटी के नाम से जाना जाता है। आज के युग में खुबसूरत बाल हर कोई चाहता है लेकिन व्यस्त दिनचर्या के चलते बालों का ख्याल रखना नामुकिन होता जा रहा है। घर पर बालों को धोना ही कई महिलाओं को अखरता है जिसके लिए वह महंगे पार्लर में जा कर हेयर स्पा आदि लेती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं बालों की समस्याओं के लिए आपके घर में एक रामबाण इलाज मौजूद है।
  • बालो की समस्या जैसे बालों का झड़ना, असमय सफेदी, रूसी की समस्या तो आम हो गई है। बालों की इन उलझनों के लिए चिरमिटी या गुंचा एक वरदान है! जी हाँ, आपके बालों को झड़ने, रुसी, सफेदी और गंजे होते सिर की समस्याओं को दूर करती है और बुढ़ापे तक आपके बालों की सभी समस्याओं से निजात दिलाता है। यह प्रयोग इतना प्रभावी है कि गंजो के बाल उगा देता है। यह पुरुषों के लिए जितना प्रभावी है उतना ही महिलाओं के लिए तो आइये जाने इस प्राकृतिक रामबाण उपाय के बारे में।

 आवश्यक सामग्री :

  • 250 ग्राम चिरमिटी/रत्ती/घुंघुचि/गुंचा (Abrus Precatorius)

  कृपया ध्यान दे :

  1. चिरमिटी/रत्ती/घुंघुचि/गुंचा (Abrus Precatorius) यह सब इसके नाम है।
  2. यह सफ़ेद और लाल + काले रंग की मनके के समान होती है।
  3. जड़ी बूटी बेचने वालो या पंसारी की दुकान पर आसानी से मिल जाती है
  4. सफ़ेद रंग कि मिले तो वह ले – न मिले तो लाल काले रंग कि ले।

गुंचा या चिरमिटी का चमत्कारी तेल बनाने का तरीका :

  1. इसे बारीक पीस कर पाउडर बना छान ले। छानने के बाद जो ऊपर मोटा अंश बचे उसे फेंके नहीं।
  2. अब छने हुए पाउडर मे से लगभग 50 ग्राम अलग निकाल कर रख लें।
  3. बाकी बचे हुए सारे 200 ग्राम पाउडर को लगभग 1.5 लीटर पानी मे धीमी आग पर इतना उबाले कि उबल के पानी लगभग 500ml रह जाये।
  4. अब इस पानी को छान कर रख ले।
  5. एक लौहे की कड़ाही मे लगभग 200 ग्राम तिल का तेल ले यदि तिल तेल का न मिले तो सरसों का भी ले सकते हैं परंतु तिल का तेल अधिक असरदार होता है। अब 500ml चिरमटी उबाल कर छाना हुआ पानी व 50 ग्राम चिरमटी का बचा हुआ पाउडर इन सभी को ठंडे तेल मे मिला ले। ध्यान रहे गरम तेल मे कुछ नही डालना है ऐसा नुकसानदायक हो सकता है। अब इस इस ठन्डे तेल में मिली सामग्री को धीमी आंच पर फिर से पकाए।
  6. पकने उपरांत जब तेल मे से पानी लगभग जल जाए। तो यह टेस्ट करने के लिये की इसमें पानी का अंश पूर्ण रूप से जल गया है केवल मात्र तेल ही शेष बचा है। इसके परिक्षण के लिये एक लौहे की तार का टुकडा या बांस की झाडू की सींख ले उस पर काटन का फोया लपेट उसे तेल में भिगो आग पर रखे। यदि चटर पटर की आवाज आए तो समझे कि अभी तेल पूरी तरह नहीं पका है। उसमें पानी का अंश शेष है तो उसे धीमी आंच पर ओर गरम होने दे।
  7. अगर तेल लगी हुई रूई तत्काल जल जाए तो समझे कि तेल पक गया है। तब इसे चूल्हे से उतार स्टील के टोप जैसे बर्तन में डाल के रख दें। साथ में तो यह ठंडा हो जायेगा और साथ ही इसमें से काला अंश टोप में निचे बैठ जायेगा। पूरी तरह ठंडा होने पर इस तेल को एक दम सूखी काँच या प्लास्टिक की बोतल में डाल लें। जिसमें पानी का अंश ना हो।

  इस चमत्कारी तेल को लगाने का तरीका :

  1. यह तेल सिर पर दिन में 2 बार सुबह – शाम लगाए। लगभग 5 मिनट मालिश करे।
  2. तेल प्रयोग के दौरान कोई भी साबुन या शैंपू सिर में न लगाए। सिर धोने के लिए खट्टी दहि – खट्टी लस्सी या नींबू का प्रयोग करे।
  3. हमे आशा ही नही पूर्ण विश्वास है की सिर्फ 1 महीने प्रयोग के बाद आपको निराश नही होना पडेगा। आपकी इच्छानुरूप परिणाम मिलने शुरू हो जायेंगे। क्योंकि यह प्रयोग हमने जिस जिस व्यक्ति पर किया परिणाम 100% मिला।
  • विशेष : इसके साथ ”अन्नतमूल की जड ” का 2 ग्राम चूर्ण रोजाना सेवन करे।

Monday, 1 May 2017

पुराने से पुराने घुटनों के दर्द का घरेलु इलाज..Home Remedies For Old Knees Pain..

घुटनों का दर्द बहुत ही पीड़ादायक होता है और यह आपको चलने-फिरने में भी असमर्थ कर देता है. यदि आपका वजन अधिक हो या आप वृद्धावस्था में हों तो घुटनों का दर्द और भी तकलीफदेह हो जाता है. यह बात कम ही लोग जानते हैं कि कुछ आसान घरेलू उपायों की मदद से घुटनों के दर्द की इस तकलीफ से छुटकारा पाया जा सकता  है.
जी हाँ ! यदि आप निम्नलिखित कारणों से घुटनों के दर्द से पीड़ित है:-
  • घुटनों की माँसपेशियो में खून का दौरा सही नहीं होना.
  • घुटनों की माँसपेशियो में खिंचाव या तनाव होना.
  • माँसपेशियो में किसी भी तरह की चोट का प्रभाव.
  • वृद्धावस्था.
तो नीचे बताये गए पांच घरेलू उपाय आपको घुटनों के दर्द से छुटकारा दिला सकते हैं.

घुटनों का दर्द – उपाय 1

नीचे बताई गयी सामग्री को मिला कर हल्दी का एक दर्द निवारक पेस्ट बना लीजिये.
  • 1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
  • 1 छोटा चम्मच पीसी हुई चीनी, या बूरा या शहद
  • 1 चुटकी चूना (जो पान में लगा कर खाया जाता है)
  • आवश्यकतानुसार पानी
इन सभी को अच्छी तरह मिला लीजिये. एक लाल रंग का गाढ़ा पेस्ट बन जाएगा.

यह पेस्ट कैसे प्रयोग करें-

  • सोने से पहले यह पेस्ट अपने घुटनों पे लगाइए. इसे सारी रात घुटनों पे लगा रहने दीजिये.
  • सुबह साधारण पानी से धो लीजिये.
  • कुछ दिनों तक प्रतिदिन इसका इस्तेमाल करने से सूजन, खिंचाव, चोट आदि के कारण होने वाला घुटनों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाएगा.

घुटनों का दर्द – उपाय 2

नीचे बताई गयी सामग्री लीजिये:-
  • 4-5 बादाम
  • 5-6 साबुत काली मिर्च
  • 10 मुनक्का
  • 6-7 अखरोट

प्रयोग

  • इन सभी चीज़ों को एक साथ मिलाकर खाएं और साथ में गर्म दूध पीयें.
  • कुछ दिन तक यह प्रयोग रोजाना करने से आपको घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा.

घुटनों का दर्द – उपाय 3

  • 1 छोटा चम्मच सोंठ का पाउडर लीजिये और इसमें थोडा सरसों का तेल मिलाइए.
  • इसे अच्छी तरह मिला कर गाड़ा पेस्ट बना लीजिये.
  • इसे अपने घुटनों पर मलिए. इसका प्रयोग आप दिन या रात कभी भी कर सकते हैं.
  • कुछ घंटों बाद इसे धो लीजिये. यह प्रयोग करने से आपको घुटनों के दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलेगा.

घुटनों का दर्द – उपाय 4

खजूर विटामिन ए, बी, सी, आयरन व फोस्फोरस का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है. इसलिए, खजूर घुटनों के दर्द सहित सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द के लिए बहुत असरकारक है.

प्रयोग

एक कप पानी में 7-8 खजूर रात भर भिगोयें.
सुबह खाली पेट ये खजूर खाएं और जिस पानी में खजूर भिगोये थे, वो पानी भी पीयें. ऐसा करने से घुटनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, और घुटनों के दर्द में बहुत लाभ मिलता है.

घुटनों का दर्द – उपाय 5

  • नारियल भी घुटनों के दर्द के लिए बहुत अच्छी औषधी है.
  • नारियल का प्रयोग:
  • रोजाना सूखा नारियल खाएं.
  • नारियल का दूध पीयें.
  • घुटनों पर दिन में दो बार नारियल के तेल की मालिश करें.
  • इससे घुटनों के दर्द में अद्भुत लाभ होता है.

कुछ अन्य घरेलु उपाय –

1. एक महीने तक लगातार रात को 15 से 20 गिरी अखरोट की भिगो कर सुबह खाली पेट खाने से घुटनो के दर्द में आराम मिलता है। दो महीने लगातार इस उपाय को करने से गठिया का रोग जड़ से ठीक हो जाता है।
2. दस कलियां लहसुन की 100 ग्राम पानी या दूध में मिला कर पीने से दर्द में जल्दी आराम मिलता है।
3.गठिया के उपचार में जामुन काफी उपयोगी है। जामुन के पेड़ छाल को खूब उबाल कर इसका लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में राहत मिलती है।
4. बथुआ के ताज़ा पत्तों का रस आधा कप सुबह शाम खाली पेट पीने से गठिया ठीक हो जाता है। इसके सेवन के 2 घंटे बाद तक कुछ भी खाये पिये नहीं।
5. अमरूद की 4 से 5 नई कोमल पत्तियों को पीस ले और उसमें थोड़ा काला नमक मिला कर खाने से जोड़ो के दर्द में राहत मिलती है।
6. गठिया के मरीज को 4 से 6 लीटर पानी हर रोज पीना चाहिये। इससे पेशाब अधिक आएगा और uric acid बाहर निकलेगा।
7. एक चम्मच सरसों के तेल में 3 से 4 कलियाँ लहसुन की पीस कर डाले और लहसुन के ठीक से पकने तक गरम करे। इस तेल से जोड़ो की मालिश करने पर दर्द से जल्दी आराम मिलेगा।
8. नारियल की गिरी हर रोज खाने से जोडों को ताक़त मिलती है।
9.कच्चे हल्दी को पीसकर थोडा सरसों का तेल मिलाकर लगाने से भी राहत मिलती है
10. तिल के तेल में काली मिर्च को जलने तक गर्म करे फिर ठंडा होने पर तेल को हलके हाथों से लगाए, joints pain से तुरंत आराम मिलेगा।
11. गाजर को पीस ले और इसमें नींबू का रस मिला कर सेवन करे। हर रोज ये उपाय करने से जोडों के लिगामेंट्स मजबूत होते है और दर्द से राहत मिलती है।

Monday, 27 February 2017

शिलाजीत भी इसके आगे फेल, यह चीज खाते ही पुरुषों में आ जाएगी ताकत

आयुर्वेद में सेहत का खजाना छुपा है। अक्सर ही लोग नादानियों के चलते शारीरिक शक्ति व क्षमता खो देते हैं, ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है, हम आपको ऐसी ताकतवर खुराक की रेसिपी बताने जा रहे हैं जिसे खाने से आपमें शक्ति लौटेगी। यकीन मानिए राजा महाराजा भी इस चीज को खाया करते थे। यहां पढ़ें उड़द दाल के लड्डू बनाने की आसानी रेसिपी –

सामग्री –

उड़द दाल – 400 ग्रसम
घी – 400 ग्राम
छोटी इलाइची – 10
पिस्ते – 10 ग्राम
काजू, किशमिश, बादाम – 100 ग्राम
बूरा या मिसी हुई मिश्री – 300 से 400 ग्राम

ऐसे बनाएं

– उड़द दाल को साफ कर तीन से चार घंटे के लिए पानी में भिगो दें।
– भीगी हुई दाल को हल्का मोटा पील सें और कढ़ाई में देसी घी में लगातार चमचे से चलाते हुए भून लें।
– दाल को ब्राउन होने तक भूनें, इसमें थोड़ा समय लग सकता है।
– अब गैस बंद कर दें और भुनी हुई दाल में बूरा मिला लें।
– इसमें बारीक कटे काजू, बादाम, पिस्ता, इलाइची पाउडर डाल कर मिलाएं।
– अब लड्डू बनाने के लिए मिश्रण तैयार है। मिश्रण को दोनों हाथों में लेकर मुट्ठी बनाते हुए छोटे छोटे लड्डू बनाएं और एयरटाइट कंटेनर में भर कर रख लें।
– एक लड्डू रोज सुबह खाली पेट गर्म दूध के साथ खाएं, शारीर की कमजोरी दूर होगी और दिमाग को ठंडक मिलेगी।


Thursday, 5 January 2017

आइये जाने फालसे के फायदे Health Benefits of Phalsa or Falsa Fruit (CalorieBee)



फालसा (ग्रेविया एशियाटिका) गर्मियों के लोकप्रिय फलों में से एक है अपने अनोखे स्वाद की वजह से इसे हर कोई पसंद करता है । इसकी तासीर ठंडी होने से यह हमारे शरीर को ठंडक पहुंचाता है । फालसा छोटे छोटे गोल-मटोल बेर के आकार के गहरे बैंगनी रंग के नरम और रसीले जिनका स्वाद खट्-मिट्ठा होता है । फालसा खनिज लवण जैसे मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, फाॅस्फोरस, कैल्शियम , लोहा, साथ ही प्रोटीन, कार्बोहाइडेट,विटामिन ए और सी और एंटीआॅक्सीडेंट से भरपूर होता है ।

खटठे मीठे स्वाद वाले फालसे के फल में विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । इसके साथ ही सिट्रिक एसिड, एमीनो एसिड, ग्रेवियानोल, बीटा एमिरिदीन, बेट्यूलीन, फ्रेडीलिन, किम्फेराल, क्वेरसेटिन, ल्यूपिनोन, ल्यूपियाल, डेल्फीनिडीन, सायनीडीन, टेरेक्सास्टेरोल पाये जाते हैं।

आइये जाने फालसे के फायदे

  1. पेट का शूलः सिकी हुई 3 ग्राम अजवायन में फालसे का 25 से 30 ग्राम रस डालकर थोड़ा सा गर्म करके पीने से पेट का शूल मिटता है।
  2. दिमाग की कमजोरीः कुछ दिनों तक नाश्ते के स्थान पर फालसे का रस उपयुक्त मात्रा में पीने से दिमाग की कमजोरी एवं सुस्ती दूर होती है, फुर्ती और शक्ति पैदा होती है।
  3. श्वास, हिचकी, कफः कफदोष से होने वाले श्वास, सर्दी तथा हिचकी में फालसे का रस थोड़ा गर्म करके उसमें थोड़ा अदरक का रस एवं सेंधा नमक डालकर पीने से कफ बाहर निकल जाता है तथा सर्दी, श्वास की तकलीफ एवं हिचकी मिट जाती है।
  4. हृदय की कमजोरीः फालसे का रस, नींबू का रस, 1 चुटकी सेंधा नमक, 1-2 काली मिर्च लेकर उसमें स्वादानुसार मिश्री मिलाकर पीने से हृदय की कमजोरी में लाभ होता है।
  5. पेट की कमजोरीः पके फालसे के रस में गुलाब जल एवं मिश्री मिलाकर रोज पीने से पेट की कमजोरी दूर होती है एवं उलटी उदरशूल, उबकाई आना आदि तकलीफें दूर होती हैं एवं रक्तदोष भी मिटता है।
  6. पित्तविकारः गर्मी के दोष, नेत्रदाह, मूत्रदाह, छाती या पेट में दाह, खट्टी डकार आदि की तकलीफ में फालसे के रस का शरबत बनाकर पीना तथा उष्ण-तीक्ष्ण खुराक बंद कर केवल सात्त्विक खुराक लेने से पित्तविकार मिटते हैं और अधिक तृषा से भी राहत मिलती है।
  7. हीमोग्लोबिन: फालसे में खनिज लवणों की अधिकता होने के कारण इसके नियमित सेवन से रक्त में हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार होता है। इससे एनीमिया का खतरा कम हो जाता है।
  8. कैंसर: वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि फालसा में रेडियोधर्मी क्षमता होती है, जिसके चलते फालसा में मौजूद पोषक तत्व कैंसर से लड़ने के मूल्यवान स्त्रोत हैं।
  9. फालसे में गर्मी के मौसम में लू लगने और उससे होने वाले बुखार से बचने का कारगर इलाज है। यह मस्तिष्क की गर्मी और खुष्की दूर करके तरोताजा रखता है। चिड़चिड़ापन दूर करता है। उल्टी और घबराहट दूर करता है।
  10. यह ज्यादा धूप में रहने के कारण शरीर के खुले अंगों पर होने वाली लालिमा, जलन, सूजन और कालेपन के इलाज में मदद करता है।
  11. इसमें मौजूद विटामिन सी शरीर में लोहे के अवशोषण में मदद करता है, जिससे रक्त को साफ करके रक्त विकारों पर काबू पाने में मदद मिलती है।
  12. विटामिन सी, खनिज लवण और एंटीऑक्सीडेंट तत्वों से भरपूर फालसा के सेवन से रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे हृदय के रोग का खतरा कम हो जाता है।
  13. यह पेशाब की जलन मिटाने में बहुत सहायक रहता है और दिल की कार्यक्षमता बढाने की शक्ति रखता है।
  14. फालसा पेड़ की पत्तियां और तने भी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं  त्वचा के कटने, छिलने, जलने, दर्दनाक चकते पड़ने, फोड़े होने, एक्जिमा, त्वचा संबंधी रोगों में फालसा की पत्तियों  को रात भर भिगोने के बाद पीस कर लगाने से बहुत लाभ होता है ।
  15. फालसा गर्मियों में पित्तनाशक व गर्मीनाशक माना जाता है। फालसा खाने से यौवन शक्ति में वृद्धि होती है।

बार बार पेशाब होने की समस्या से मुक्ति पाने का घरेलु नुस्खा Too Much Urination Problem

100 वृद्ध महिलाओं को झुक कर खांसने के लिए कहा जाए, तो हम पाएँगे कि उनमें 80-90 प्रतिशत का पेशाब निकल गया है | पेशाब की मात्रा अलग-अलग हो सकती है की यह एक काफी आम समस्या है | इसके लिए जिस चिकित्सय शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, वह है – ‘इन्कोन्टीनेन्स’ | इसका अर्थ है मूत्रमार्ग से आपकी मर्जी के खिलाफ पेशाब निकलना और आपका उसे रोक पाने से असमर्थ रहना |

जानिए पेशाब बनने का तरीका

शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों की निरंतर सक्रियता के कारण हमारा शरीर अपशिष्ट पदार्थ पैदा करता है | उदर के पिछले हिस्से में पसलियों के नीचे स्थित गुर्दे इन अपशिष्टों को खून और पेशाब में से छानते हैं | पेशाब मूत्राशय में एकत्रित हो जाता है | जब यह आधे पिंट (24,436 क्यूबिक इंच) के आसपास एकत्रित हो जाता है, तो मूत्रत्याग की इच्छा पैदा होती है | यदि आसपास कोई टॉयलेट नहीं है या आप किसी काम में व्यस्त है, तो ऐसी स्थितियों में मस्तिष्क की इच्छा दबा लेता है | जब एकत्रित मूत्र की मात्रा एक पिंट या इससे ज्यादा हो जाती है आर पेशाब करना ही पड़ता है | पेशाब करने के लिए तैयार हो जाने के बाद, मस्तिष्क मूत्राशय को सिकुड़ने और मूत्रमार्ग को खुलने का सन्देश देता है और पेशाब बाहर आ जाता है | सामान्य व्यक्ति आम तौर पर दिन में 4-7 और रात में 1-2 बार पेशाब करता है |

पेशाब बाहर क्यों आता है

पेट से संबंधित समस्याओं, विशेषकर कब्ज, के कारण मूत्राशय से पेशाब रिस सकता है, क्योंकि मूत्राशय और मूत्रमार्ग का द्वार, गर्भाशय तथा योनि (जननांग) व मलपथ (मलाशय) को सहारा देने वाली मांसपेशियां एक ही होती हैं | एक रास्ते सहारे और क्रियाकलाप में गड़बड़ होने से दूसरे ऐसा रास्तों का सहारा और कार्य भी प्रभावित होते हैं |

पेशाब नियंत्रण अक्षमता के प्रकार

  1. टॉयलेट सीट पर बैठने या वहाँ तक पहुँचने से पहले ही मूत्रत्याग की गहरी इच्छा के कारण भी ऐसा होता है | टॉयलेट के नल से बहते पानी के कारण भी पेशाब करने की गहन इच्छा पैदा हो सकती है और पेशाब की कुछ बूँद रिस सकती है |
    3 मिश्रित नियंत्रण अक्षमता : जब उपरोक्त कारण एक से अधिक संख्या में मौजूद हों |
  2. दबाव जनित अनियंत्रण मूत्रमार्ग (यूरिथ्रा) के कमजोर होने के कारण होता है | आम तौर पर यह शिशु जन्म के कारण होता है, जब सहारा देने वाली मांसपेशियां खिंच/ जख्मी हो कर कमजोर हो जाती हैं | कमजोरी आम तौर पर मासिक धर्म रूक जाने (मिनोपौज) पर हर्मोस की कमी से पैदा होती है | मोटापे से भी मांसपेशियां पर दबाव बढ़ जाता है |
  3. समान्यता: उम्र बढ़ने के साथ मूत्राशय मनमाने ढंग से व्यवहार करने लगता है | चेतावनी देने की आवधि कम होती जाती है और मूत्राशय को ज्यादा बार खाली करने की जरूरत महसूस होने लगती है | जब यह एक समस्या बन जाती है और पेशाब इच्छा के विरूद्ध रिसने लगता है, तब मदद की जरूरत होती है | कभी – कभी संक्रमण, मूत्राशय में पथरी या कैंसर, एल्जिमर रोग, पार्किन्सोनिज्म (दोनों ही मस्तिष्क संबंधी रोग हैं), स्ट्रोक और मल्टीपल सिक्लेराइसिस (बहुल ऊतक-दृढ़न) के कारण भी पेशाब को नियंत्रित करने की अक्षमता पैदा हो सकती है | इनसे मूत्र – अनियंत्रण के अतिरिक्त अन्य समस्याएँ भी पैदा हो सकती हैं – जैसे, बार – बार पेशाब आना, मूत्रत्याग की गहरी इच्छा होना और नोक्टूरियायानी रातों को कई बार पेशाब जाना |

घरेलु नुस्खे


  1. कुलथी का प्रयोग कुलथी में कैल्‍शियम, आयरन और पॉलीफिनॉल होता है, जो कि एंटीऑक्‍सीडेंट से भरा होता है। थोड़ी सी कुलथी को गुड के साथ रोज सुबह लेने से मूत्राशय की खराबी दूर हो जाएगी।
  2. शहद और तुलसी एक चम्‍मच शहद के साथ 3-4 तुलसी की पत्‍तियां मिलाएं और खाली पेट सुबह खाएं।
  3. मेथी मेथी पावडर को सूखी अदरक और शहद के साथ मिला कर पानी के साथ खाएं। ऐसा हर दो दिन पर करें। आपको रिजल्‍ट साफ दिखाई देगा।
  4. बेकिंग सोडा यह पेशाब के पीएच बैलेंस को नियंत्रित करेगा। आधा चम्‍मच बेकिंग सोडा को 1 गिलास पानी के साथ मिक्‍स कर के पियें
  5. खूब पानी पियें आप जितना ज्‍यादा पानी पियेंगी आपका शरीर उतना ही ज्‍यादा हाइड्रेट रहेगा और किडनी से गंदगी निकलेगी। एक पुरुष को लगभग 3 लीटर पानी हर दिन पीना चाहिये।
  6. विटामिन सी अधिक मात्रा में लें। विटामिन सी पेशाब में अम्लता को बढ़ाता है; जीवाणु अम्लीय परिवेश में नहीं बढ़ सकते हैं।
  7. अनार पेस्‍ट यह मूत्राशय की गर्मी को कम करता है। अनार के छिलके का पेस्‍ट बनाइये और उसका छोटा भाग पानी के साथ दिन में दो बार खाइये। ऐसा 5 दिनों के लिये करें, आपको इससे आराम मिलेगा।
  8. तिल के बीज तिल के दानों में एंटी ऑक्‍सीडेंट्स, मिनरल्‍स और विटामिन्‍स होते हैं। आप इसे गुड या फिर अजवाइन के साथ सेवन कर सकते हैं।
  9. दही दही को हर रोज खाने के साथ खाना चाहिये। इसमें मौजूद प्रोबायोटिक ब्‍लैडर में खतरनाक बैक्‍टीरिया को बढ़ने से रोकता है।
  10. आवश्‍यक तेल चंदन, लोबान और टी ट्री ऑइल जैसे आवश्यक तेलों से अपने प्राइवेट पार्ट की मालिश करने से उस जगह की जलन और बार बार पेशाब आने की परेशानी खतम होती है। बेस्‍ट रिजल्‍ट के लिये अरोमा थैरेपिस्‍ट की सलाह लें।

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Friday, 30 December 2016

सर्दी के मौसम में खाएंगे अलसी के लड्डू, नहीं होंगी ये बीमारियां Amazing benifit of Alsi ke-Laddu in winter-season

अलसी में मौजूद घुलनशील फाइबर प्राकृतिक रुप से आपके शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित कर रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है 

 सर्दी के मौसम में सर्दी, जुकाम, हाथ-पैंरों और जोड़ों में दर्द की समस्या कई लोगों को होती है। इस मौसम में हमे गर्मागम चीजें अच्छी लगती है। सर्दियों में आप अपने खाने के शेयड्यूल में कुछ बदलाव करके इन बीमारियों से बच सकते है। सर्दी के मौसम में खुद को गर्म रखने के लिए गर्म तासीर वाला भोजन करना बहुत जरूरी है। आज हम आपको ऐसी एक स्वादिष्ट खाने की चीज के बारे में बताने जा रहे है जो आपको स्वाद को बढ़ाने के साथ-साथ शरीर के लिए भी काफी फायदेमंद है।

अलसी के नियमित सेवन से नहीं होती कब्ज, खांसी
वो स्वादिष्ट चीज है अलसी के लड्डू। सर्दी के मौसम में असली के लड्डू का सेवन हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक है। सर्दियों में रोज सुबह अलसी के लड्डू खाने से बॉडी को ताजगी और स्फूर्ति का अहसास होता है। यह हमारी बॉडी को इतनी ताकत देता है कि इस मौसम में होने वाली कई बीमारियों तो यूं ही गायब हो जाती है। इसके अलावा इसके नियमित सेवन से आप कब्ज, खांसी आदि बीमारियों से बचे रहते हैं। यहीं नहीं अलसी शरीर के अंदर मौजूद अतिरिक्त फैट कम करने में असरदार है।

कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित कर रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है अलसी
यह हमारे बॉडी के वजन को नियंत्रित करने का भी काम करती है। अलसी में मौजूद घुलनशील फाइबर प्राकृतिक रुप से आपके शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित कर रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है। अलसी में अल्फा लाइनोइक एसिड अर्थराइटिस, अस्थमा, डायबिटीज और कैंसर से लडऩे में मदद करता है। इसके अलावा अलसी के लड्डू में ओमेगा-3 फैटी एसिड पया जाता है जो कि हमारी बॉडी को इन बीमारियों से लडऩे की ताकत देता है। इस तरह आप अलसी के लड्डू खाकर अपने आप सर्दियों में इस तरह की कई बीमारियों से बचा सकते हैं।