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Wednesday, 25 October 2017

Bermuda Grass(दूब घास) - एक चमत्कारी औषधी


हमारे संस्कार में अपना विशेष महत्व रखने वाली यह घास भगवान श्री गणेश की सर्वाधिक प्रिय औषधीय गुणों से युक्त दुब या दुबा घास जमीन में फैलती है और ऊँचाई 2 से 8 सेमी0 होती है। इसमें फैलने की अद्भुत क्षमता होती है इसलिये हमारे वहाँ आशीष स्वरूप कहा भी जाता है ‘दुब जस परणि हो जाय’।

आज हमारे संस्कारों में चित्त में बसी इस घास की उत्पत्ति इसके आयुर्वेदिक महत्व व इसके महत्वपूर्ण रासायनिक घटकों से आपका परिचय कराते हैं। वैसे तो हम इससे अच्छी तरह परिचित हैं। बचपन में जब भी दूध के दाँत टूटे तो इसकी जड़ में दबाये। गणेश जी की पूजा हो या दूब जोड़ की पूजा या फिर संकट की पूजा दूब हमसे जुड़ा रहा। दूब भारत में सभी जगह पाई जाने वाली औषधीय गुणों से युक्त घास है।

दूब घास में कई रासायनिक घटक पाये जाते हैं। जिसके कारण इसका औषधीय महत्व बढ़ जाता है। इसमें प्रोटीन, एंजाइम, राख, कैल्शियम, मैगनीज, फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम पाया जाता है।

दूब घास औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण महत्वपूर्ण तो है ही, धर्म के साथ हमारे पूर्वजों ने इसे और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। दूब घास की उत्पत्ति को लेकर हमारी पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि समुद्र मंथन के समय देवता और राक्षस लगे हुए थे। कुछ समय बीत जाने के बाद देवता और राक्षस थक गये तो भगवान विष्णु मंदरांचल पर्वत को अपनी जंघा पर रख मंथन करने लगे। जिससे उत्पन्न हुए घर्षण से शरीर से रोम समुद्र में गिरने लगे और किनारे आकर दूब के रूप में जम गये।

समुद्र मंथन के उपरान्त जब अमृत निकला तो उसे इस दूब में रखा गया। इसी कारण अमृत के प्रभाव से यह दूब भी अमृत तुल्य हो गया। दूब घास एक ऐसी घास है। जो किसी भी परिस्थिति में जब अन्य घासें नष्ट होने लगती हैं तब भी अपना विकास करने में सक्षम है। एक बार उगने पर यह आसानी से नष्ट नहीं होती है।

दूब घास को पशुओं के लिए भी सम्पूर्ण पोषण माना गया है। महाराणा प्रताप ने भी इसी को खाकर पोषण प्राप्त किया था।
इस घास के औषधीय गुण भी कम नहीं हैं। दूब घास वात व कफ रोगों में लाभदायक होती है। यह घावों को भरने के लिए लाभदायक होता है। यह मस्तिष्क को पोषण दे उसके काम करने के तरीके को बेहतर बनाती है। नकसीर में इसका रस नाक में डालने पर लाभ होता है। ऐनिमिया में इसका प्रयोग लाभदायक होता है। दूब पाचन को ठीक करने में सहायक होती है। रक्त की शुðि करती है, और भी कई रोगों में यह प्रयुक्त होती है जैसे कब्ज, मनोवृत्ति, पाइल्स, मासिक धर्म में गड़बड़ी, हेमरेज, ऐपिथेसिस, अपच, मिथली, उपदंश आदि कई प्रकार के रोगों में ये रामबाण औषधि है। इसको पेस्ट, पाउडर व रस तीनों रूपों में इस्तेमाल किया जाता है।

इसमें वर्ष में दो बार फूल आते हैं। सितम्बर-अक्टूबर व फरवरी-मार्च में। इसे लाॅन में लगाया जा सकता है। इसे देखभाल की भी अधिक आवश्यकता नहीं होती है। यह विघन हरण, रोग हरण, अमूल्य वरदान है।

ऐसा माना जाता है कि सुबह-शाम घास पर चलना सेहत के लिए अच्छा होता है, खासकर हमारी आंखों के लिए। लेकिन क्या आपने जानते हैं क्यों। चलिए हम बताते हैं आपको वो फायदे जो केवल हरी घास पर चलने से आपके दिमाग और शरीर को प्राप्त होते हैं।

हरी घास आपके शरीर को ऐसे हार्मोन्स बनाने के लिए प्रेरित करता है जिनसे आपको शांति मिले।

रिफ्लेक्सोलॉजी- हमारे पैर रिफ्लेक्सोलॉजी का मुख्य केंद्र हैं जो शरीर के विभिन्न हिस्सों से जुड़े हुए हैं। रिफ्लेक्सोलॉजी के नियमों के मुताबिक पैर में मौजूद प्रेशर पॉइंट्स को आराम पहुंचने से शरीर के बाकी हिस्सों को भी फायदा होता है। आंख, चेहरे की नसें, प्लीहा, पेट, दिमाग, किडनी जैसे विभिन्न अंगों के लिए पॉइंट हमारे पैरों में मौजूद होते हैं। हरी घास पर चलने से इन पॉइंट्स पर दबाव पड़ता है और हमारा शरीर की कार्यक्षमता बढ़ती है। doctor kehte हैं कि जब हम घास पर चलते है तो पैर से जुड़ी हुई नसों पर हल्के से दबाव बनता है और हमारे पूरे शरीर को आराम मिलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि जब हम चलते हैं तो अंगूठे, पहली और दूसरी उंगली पर सबसे अधिक प्रेशर पड़ता है और रिफ्लेक्सोलॉजी में आंखों के पॉइंट दूसरी और तीसरी उंगली पर बताए जाते हैं।

Thursday, 24 November 2016

अमरूद के सेवन से मिलने वाले 15 फायदे 15 Benefits Arising From the Use of Guava

अमरूद में विटामिन सी और शर्करा काफी मात्रा में होती है। अमरूद में पेक्टिन की मात्रा भी बहुत अधिक होती है। अमरूद को इसके बीजों के साथ खाना अत्यंत उपयोगी होता है, जिसके कारण पेट साफ रहता है। अमरूद का उपयोग चटनियां, जेली, मुरब्बा और फल से पनीर बनाने में किया जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर ठंड में अमरूद खाने के क्या फायदे हो सकते हैं।

अमरूद के सेवन से मिलने वाले 15 फायदे


  1. अमरूद हाई एनर्जी फ्रूट है जिसमें भरपूर मात्रा में विटामिन और मिनरल्‍स पाए जाते हैं। ये तत्व हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं।
  2. डीएनए को सुधारे अमरूद में पाया जाने वाला विटामिन बी-9 शरीर की कोशिकाओं और डीएनए को सुधारने का काम करता है।
  3. दिल का साथी अमरूद में मौजूद पोटैशियम और मैग्‍नीशियम दिल और मांसपेशियों को दुरुस्‍त रखकर उन्‍हें कई बीमारियों से बचाता है।
  4. अगर आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं तो अमरूद का सेवन करना बहुत फायदेमंद होगा।
  5. अमरूद के नियमित सेवन से सर्दी जुकाम जैसी समस्‍याओं के होने का खतरा कम हो जाता है।
  6. अमरूद में पाया जाने वाला विटामिन ए और ई आंखों, बालों और त्‍वचा को पोषण देता है।
  7. अमरूद में मौजूद लाइकोपीन नामक फाइटो न्‍यूट्र‍िएंट्स शरीर को कैंसर और ट्यूमर के खतरे से बचाने में सहायक होते हैं।
  8. अमरूद में बीटा कैरोटीन होता है जो शरीर को त्‍वचा संबंधी बीमारियों से बचाता है।
  9. अमरूद का नियमित सेवन करने से कब्‍ज की समस्‍या में राहत मिलती है।
  10. फल के साथ ही अमरूद की पत्तियों का सेवन मुंह के छालों को दूर करने में कारगर होता है।
  11. अमरूद का रायता, चटनी, अचार और शेक खाने का स्‍वाद बढ़ा देते हैं।
  12. अमरूद मेटाबॉलिज्‍म को सही रखता है जिससे शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल का स्‍तर नियंत्रित रहता है।
  13. कच्‍चे अमरूद में पके अमरूद की अपेक्षा विटामिन सी अधिक पाया जाता है। इसलिए कच्‍चा अमरूद खाना ज्‍यादा फायदेमंद होता है।
  14. अमरूद में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसलिए यह डायबिटिज के मरीजों के लिए बहुत अच्‍छा होता है।
  15. थायरॉइडनॉर्मल थायरॉइड में भी डॉक्‍टर अमरूद खाने की सलाह देते हैं।


पेटदर्द
अमरूद के पेड़ की पत्तियों को बारीक पीसकर काले नमक के साथ चाटने से लाभ होता है। अमरूद के फल की फुगनी (अमरूद के फल के नीचे वाले छोटे पत्ते) में थोड़ा-सी मात्रा में सेंधानमक को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट में दर्द समाप्त होता है। यदि पेट दर्द की शिकायत हो तो अमरूद की कोमल पत्तियों को पीसकर पानी में मिलाकर पीने से आराम होता है।

अपच
अपच, अग्निमान्द्य और अफारा के लिए अमरूद बहुत ही उत्तम औषधि है। इन रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को 250 ग्राम अमरूद भोजन करने के बाद खाना चाहिए। जिन लोगों को कब्ज न हो तो उन्हें खाना खाने से पहले खाना चाहिए।

बवासीर
सुबह खाली पेट 200-300 ग्राम अमरूद नियमित रूप से सेवन करने से बवासीर में लाभ मिलता है। कुछ दिनों तक रोजाना सुबह खाली पेट 250 ग्राम अमरूद खाने से भी बवासीर ठीक हो जाती है। बवासीर को दूर करने के लिए सुबह खाली पेट अमरूद खाना उत्तम है। मल-त्याग करते समय बांयें पैर पर जोर देकर बैठें। इस प्रयोग से बवासीर नहीं होती है और मल साफ आता है। पके अमरुद खाने से पेट का कब्ज खत्म होता है, जिससे बवासीर रोग दूर हो जाता है।

कब्ज
अच्छी किस्म के तरोताजा बड़े-बड़े अमरूद लेकर उसके छिलकों को निकालकर टुकड़े कर लें और धीमी आग पर पानी में उबालें। जब अमरूद आधे पककर नरम हो जाएं, तब नीचे उतारकर कपड़े में डालकर पानी निकाल लें। उसके बाद उससे 3 गुना शक्कर लेकर उसकी चासनी बनायें और अमरूद के टुकड़े उसमें डाल दें। फिर उसमें इलायची के दानों का चूर्ण और केसर इच्छानुसार डालकर मुरब्बा बनायें। ठंडा होने पर इस मुरब्बे को चीनी-मिट्टी के बर्तन में भरकर, उसका मुंह बंद करके थोड़े दिन तक रख छोड़े। यह मुरब्बा 20-25 ग्राम की मात्रा में रोजाना खाने से कब्जियत दूर होती है।

खांसी
एक कच्चे अमरूद को लेकर चाकू से कुरेदकर उसका थोड़ा-सा गूदा निकाल लेते हैं। फिर इस अमरूद में पिसी हुई अजवायन तथा पिसा हुआ कालानमक 6-6 ग्राम की मात्रा में लेकर भर देते हैं। इसके बाद अमरूद पर कपड़ा लपेटकर उसमें गीली मिट्टी का लेप चढ़ाकर आग में भून लेते हैं पकने के बाद इसके ऊपर से मिट्टी और कपड़ा हटाकर अमरूद को पीस लेते हैं। इसे आधा-आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम रोगी को चटाने से काली खांसी में लाभ होता है।

जल्द घाव भरना
अमरूद की कोमल पत्तियां उबालकर पीने से पुराने दस्तों का रोग ठीक हो जाता है। दस्तों में आंव आती रहे, आंतों में सूजन आ जाए, घाव हो जाए तो 2-3 महीने लगातार 250 ग्राम अमरूद रोजाना खाते रहने से दस्तों में लाभ होता है। अमरूद में-टैनिक एसिड होता है, जिसका प्रधान काम घाव भरना है। इससे आंतों के घाव भरकर आंते स्वस्थ हो जाती हैं।

अमरूद कब हो सकता है हानिकारक

शीत प्रकृति वालों को और जिनका आमाशय कमजोर हो, उनके लिए अमरूद हानिकारक होता है। बारिश के सीजन में अमरूद के अंदर सूक्ष्म धागे जैसे सफेद कीडे़ पैदा हो जाते हैं जिसे खाने वाले व्यक्ति को पेट दर्द, अफारा, हैजा जैसे विकार हो सकते हैं। हालांकि ठंड में ताजे अमरूद खाने से फायदेमंद होते हैं, लेकिन यदि कुछ दिन तक पुराने हो जाए तो नहीं खाना चाहिए। इसके बीज सख्म होने के कारण आसानी से नहीं पचते और यदि ये एपेन्डिक्स में चले जाए, तो रोग पैदा कर सकते हैं। अत: इनके बीजों के सेवन से बचना चाहिए।