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Tuesday, 25 July 2017

चिरचिटा या अपामार्ग (Chaff Tree) के 20 अद्भुत फ़ायदे :


अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) का पौधा भारत के सभी सूखे क्षेत्रों में उत्पन्न होता है यह गांवों में अधिक मिलता है खेतों के आसपास घास के साथ आमतौर पाया जाता है इसे बोलचाल की भाषा में आंधीझाड़ा या चिरचिटा (Chaff Tree) भी कहते हैं-अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है आमतौर पर लाल और सफेद दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं-सफेद अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और सफेद रंग के दाग युक्त होते हैं इसके अलावा फल चपटे होते हैं जबकि लाल अपामार्ग (Red Chaff Tree) का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के दाग होते हैं।


  • इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है फिर भी सफेद अपामार्ग(White chaff tree) श्रेष्ठ माना जाता है इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं इसका पौधा वर्षा ऋतु में पैदा होकर गर्मी में सूख जाता है।


अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में गर्म होता है। यह पाचनशक्तिवर्द्धक, दस्तावर (दस्त लाने वाला), रुचिकारक, दर्द-निवारक, विष, कृमि व पथरी नाशक, रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला), बुखारनाशक, श्वास रोग नाशक, भूख को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।


चिरचिटा या अपामार्ग (Chaff Tree) के 20 अद्भुत
फ़ायदे :

1. गठिया रोग : 
  • अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर, गर्म करके गठिया में बांधने से दर्द व सूजन दूर होती है।
2. पित्त की पथरी : 
  • पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10 ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से पूरा लाभ होता है। काढ़ा अगर गर्म-गर्म ही खायें तो लाभ होगा।
3. यकृत का बढ़ना : 
  • अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग के मिट जाते हैं।
4. लकवा :
  • एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से लकवा या पक्षाघात ठीक हो जाता है।
5. पेट का बढ़ा होना या लटकना : 
  • चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5 ग्राम से लेकर 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता है।
6. बवासीर : 
  • अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 पीस को जल के साथ पीस छानकर सुबह-शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।
  • खूनी बवासीर पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के पानी के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।
7. मोटापा : 
  • अधिक भोजन करने के कारण जिनका वजन बढ़ रहा हो, उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर की चर्बी धीरे-धीरे घटने भी लगेगी।
8. कमजोरी : 
  • अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप दूध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से शरीर में पुष्टता आती है।
9. सिर में दर्द : 
  • अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए लेप को मस्तक पर लगाने से सिर दर्द दूर होता है।
10. संतान प्राप्ति : 
  • अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित सेवन से भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
11. मलेरिया : 
  • अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर की मात्रा में लेकर पीस लें, फिर इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां तैयार कर लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों एक-एक गोली सुबह-शाम भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है।
12. गंजापन : 
  • सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर मसल लें और मलहम बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से पुन: बाल उगने की संभावना होगी।
13. दांतों का दर्द और गुहा या खाँच (cavity) : 
  • इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई का फोया बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के दर्द में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी गुहा या खाँच को भरने में मदद करता है।
14. खुजली :
  • अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार करें और इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों cavity में खुजली दूर जाएगी।
15. आधाशीशी या आधे सिर में दर्द : 
  • इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही आधाशीशी, मस्तक की जड़ता में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर पैदा हुए कीड़े भी झड़ जाते हैं।
16. ब्रोंकाइटिस : 
  • जीर्ण कफ विकारों और वायु प्रणाली दोषों में अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, घी और शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।
17. खांसी : 
  • खांसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में बहुत ही लाभ होता है।
18. गुर्दे का दर्द : 
  • अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में घोलकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। गुर्दे के दर्द के लिए यह प्रधान औषधि है।
19. गुर्दे के रोग : 
  • 5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम सुबह-शाम मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से गुर्दे की पथरी खत्म हो जाती है । या 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी के साथ सुबह-शाम पीने से पथरी रोग ठीक होता है।
20. दमा या अस्थमा :  
  • चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से खोद लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ खाएं इससे श्वास रोग दूर हो जाता है।
  • अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से छाती पर जमा कफ छूटकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है।


Thursday, 24 September 2015

आस्थमा क्या होता है? आस्थमा किन चीजों से होता है? आस्थमा के क्या लक्षण होते हैं? आस्थमा अटैक से कैसे बचें ?



आस्थमा क्या होता है?

आस्थमा, दमा या हफनी को कहते हैं। इस बीमारी में सांस लेने में तकलीफ होता है। यह सांस के नली का एक स्थायी बीमारी है, जो कि आजीवन रहता है।

आस्थमा के क्या लक्षण होते हैं?

*.दमा या हफनी होना, खास करके सांस छोडते वख्त
*.खांसी होना
*.सांस लेने में तकलीफ़
*.छाती में कफ जमा हुआ लगना
*.छाती जकडा हुआ लगना
*.फेफड़ा में संक्रमित बीमारी होना, जिसे न्युमोनिया (pneumonia) कहते ह
अस्थमा के कारण
अस्थमा कई कारणों से हो सकता है। अनेक लोगों में यह एलर्जी मौसम, खाद्य पदार्थ, दवाइयाँ इत्र, परफ्यूम जैसी खुशबू और कुछ अन्य प्रकार के पदार्थों से हो सकता हैं; कुछ लोग रुई के बारीक रेशे, आटे की धूल, कागज की धूल, कुछ फूलों के पराग, पशुओं के बाल, फफूँद और कॉकरोज जैसे कीड़े के प्रति एलर्जित होते हैं। जिन खाद्य पदार्थों से आमतौर पर एलर्जी होती है उनमें गेहूँ, आटा दूध, चॉकलेट, बींस की फलियाँ, आलू, सूअर और गाय का मांस इत्यादि शामिल हैं।
कुछ अन्य लोगों के शरीर का रसायन असामान्य होता है, जिसमें उनके शरीर के एंजाइम या फेफड़ों के भीतर मांसपेशियों की दोषपूर्ण प्रक्रिया शामिल होती है। अनेक बार अस्थमा एलर्जिक और गैर-एलर्जीवाली स्थितियों के मेल से भड़कता है, जिसमें भावनात्मक दबाव, वायु प्रदूषण, विभिन्न संक्रमण और आनुवंशिक कारण शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार, जब माता-पिता दोनों को अस्थमा या हे फीवर (Hay Fever) होता है तो ऐसे 75 से 100 प्रतिशत माता-पिता के बच्चों में भी एलर्जी की संभावनाएँ पाई जाती हैं।

आस्थमा किन चीजों से होता है?


*.जानवरों से (जानवरों की त्वचा, बाल, पंख या रोयें से)
*.पेड़ और घास के पराग कण*.धूलकण
*.सिगरेट का धुआं*.वायु प्रदूषण
*.ठंडी हवा या मौसमी बदलाव*.पेंट या रसोई की तीखी गंध
*.सुगंधित उत्पाद*.मजबूत भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव
*.एस्पिरीन और अन्य दवाए
ं*.विशेष रसायन या धूल जैसे अवयव*.पारिवारिक इतिहास
*.तंबाकू के धुएं से भरे माहौल में रहनेवाले शिशुओं को अस्थमा होने का खतरा होता है। यदि गर्भावस्था के दौरान कोई महिला तंबाकू के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा होने का खतरा होता है।
*.मोटापे से भी अस्थमा हो सकता है। अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं।

आस्थमा अटैक से कैसे बचें ?


*.शहद एक सबसे आम घरेलू उपचार है, जो कि अस्थमा के इलाज के लिये प्रयोग होती है। अस्थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से जल्द राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्लासपानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी से राहत मिलती है। शहद बलगम को ठीक करता है, जो अस्थमा की परेशानी पैदा करता है।

*.एक कप घिसी हुई मूली में एच चम्मच शहद और नींबू का रस मिला कर 20 मिनट तक पकाएं। इस मिश्रण को हर रोज एक चम्मच खाएं। यह इलाज बड़ा ही प्रसिद्ध और असरदार है।

*.करेला, जो कि अस्थमा का असरदार इलाज है, उसके एक चम्मच पेस्ट को लेकर शहद और तुलसी के पत्ते के रस के साथ मिला कर खाएं। इससे अंदर की एलर्जीसे बहुत राहत मिलती है।

*अंदर की एलर्जी को सही करने के लिये मेथी भी बहुत असरदार होती है। एक ग्लास पानी के साथ मेथी के कुछ दानों को तब तक उबालें, जब तक पानी एक तिहाई न हो जाए। अब उसी पानी में शहद और अदरक का रस मिला लें। इस रस को दिन में एक बार पीने से जरुर राहत मिलेगी।

*अस्थमा -क्या करें और क्या न करेंऐसा करें

*.धूल से बचें और धूल -कण अस्थमा से प्रभावित लोगों के लिए एक आम ट्रिगर है |

*.एयरटाइट गद्दे .बॉक्स स्प्रिंग और तकिए के कवर का इस्तेमाल करें ये वे चीजें है जहां पर अक्सर धूल-कण होते है जो अस्थमा को ट्रिगर करते ह

*.पालतू जानवरों को हर हफ्ते नहलाएं.इससे आपके घर में गंदगी पर कंट्रोल रहेगा |*.अस्थमा से प्रभावित बच्चों को उनकी उम्र वाले बच्चों के साथ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने दें|

*.अस्थमा के बारे में अपनी और या अपने बच्चे की जानकारी बढाएं इससे इस बीमारी पर अच्छी तरह से कंट्रोल करने की समझ बढेगी |

*.बेड सीट और मनपसंद स्टफड खिलोंनों को हर हफ्ते धोंए वह भी अच्छी क्वालिटीवाल एलर्जक को घटाने वाले डिटर्जेंट के साथ |

*.सख्त सतह वाले कारपेंट अपनाए |

*.एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है |

*.किसी तरह की तकलीफ होने पर या आपकी दवाइयों के आप पर बेअसर होने पर अपने हमसे संर्पक करें |ऐसा न करें

*.यदि आपके घर में पालतू जानवर है तो उसे अपने विस्तर पर या बेडरूम में न आने दें |

*.पंखोंवाले तकिए का इस्तेमाल न करें |

*.घर में या अस्थमा से प्रभावित लोगों के आस -पास धूम्रपान न करें संभव हो तो धूम्रपान ही करना बंद करदें क्योंकि अस्थमा से प्रभावित कुछ लोगों को कपडोंपर धुएं की महक से ही अटैक आ सकता है |

*.मोल्ड की संभावना वाली जगहों जैसे गार्डन या पत्तियों के ढेरों में काम न करें और न ही खेलें |*.दोपहर के वक्त जब परागकणों की संख्या बढ जाती है बाहर न ही काम करें और न ही खेलें |

*.अस्थमा से प्रभावित व्यक्ति से किसी तरह का अलग व्यवहार न करें
|
*.अस्थमा का अटैक आने पर न घबराएं.इससे प्रॉब्लम और भीबढ जाएगी. ये बात उन माता-पिता को ध्यान देने वाली हैजिनके बच्चों को अस्थमा है अस्थमा अटैक के दौरान बच्चों को आपकी प्रतिक्रिया का असर पडता है यदि आप ही घबरा जाएंगे तो आपको देख उनकी भी घबराहट और भी बढ सकती है |

आस्थमा क्या होता है? आस्थमा किन चीजों से होता है? आस्थमा के क्या लक्षण होते हैं? आस्थमा अटैक से कैसे बचें ?





आस्थमा क्या होता है?

आस्थमा, दमा या हफनी को कहते हैं। इस बीमारी में सांस लेने में तकलीफ होता है। यह सांस के नली का एक स्थायी बीमारी है, जो कि आजीवन रहता है।

आस्थमा में क्या होता है?

इस बीमारी में, सांस लेने के नली में तीन चीज़ होता है, जिससे कि सांस लेने में तकलीफ होता है।
  • संवेदनशील होना - सांस लेते समय, अनके तरह के कण, बाहरी वातावरण से फेफड़े के अंदर पहुंच जाते हैं। सामान्य स्थिती में शरीर, इन कण को खांसी के बलगम के द्वारा बाहर निकाल देता है। आस्थमा के मरीज में, इन कण के विरुद्ध, अत्याधिक और गाढ़ा बलगम बनने लगता है। इन कण को एलर्जन (allergen) कहते हैं, क्योंकि उनसे आस्थमा के मरीज़ को एलर्जी (allergy) होता है।
  • सूजन और जलन होना – इसे इनफ्लेमेशन कहते हैं। आस्थमा के मरीज में, इस दौरान सांस के नली भी सूज जाते हैं।
  • संकरा होना - सांस के नली के चारो तरफ मांस पेशी होते हैं। सामान्य स्थिती में मांस पेशी ढीले पड़े रहते हैं, लेकिन आस्थमा का अटैक होने पर वो सांस के नली के चारो ओर से कस देते हैं। इससे सांस के नली संकरा हो जाते हैं। बाद में समय के साथ या दवा लेने पर, मांस पेशी फिर ढीले पड़ जाते हैं।

आस्थमा किन चीजों से होता है? |Asthma - Trigger factors | 


आस्थमा (दमा, हफनी) का बीमारी हमेशा के लिए होता है| यह कभी खत्म नहीं होता है, किंतु अपना ध्यान रखने से आप अपने या अपने सगे संबन्धी के आस्थमा को नियंत्रण में रख सकते हैं| घर और बाहर में अनेक चीज होती हैं जिनके कारण आस्थमा चालू हो सकता है| ये कारक नीचे दिए गए हैं|

1  हवा में प्रदूषण सबसे मुख्य कारण है

  • जैसे की गाड़ियों से निकलता धुआं
  • धुम्रपान करते हुए व्यक्ति के साथ रहना | इसीलिए घर में कोई भी धूम्रपान करे, असर सब पर पड़ता है|
  • वसंत ऋतू में जब नए फूल निकलते हैं, तो उसके पौलन या फूलों के पराग से अस्थमा हो सकता है|
  • गर्दा से
  • सेंट, परफ्यूम, डियोडोरेंट, जेल, क्रीम, लोशन, स्प्रे, साबुन इत्यादी के गंध से
  • तेल युक्त पेंट से (Paint)

2  बाहर के वातावरण में बदलाव से

  • ठंडा हवा में सांस लेना

3  गहरा सांस लेने से, जैसे की

  • व्यायाम से या बच्चे को खेलने से भी अस्थमा हो सकता है| जिस बच्चे को आस्थमा के कारण खेलने में दिक्कत होता है, उसे खेल से आधा घंटा पहले दवा लेना चाहिए| ध्यान रहे की रोजाना व्यायाम या खेलने से आस्थ्मा कम हो सकता है|

4  मन के भावना से

  • आपके मन के भावना का आस्थमा पर बहुत असर होता है। किसी भी आवेश या उत्तेजना से, दमा के मरीज में, आस्थमा अटैक हो सकता है। जैसे कि अधिक हँसने से, रोने से, गुस्सा से या अन्य किसी भावना से अधिक तेज से सांस लेने से, आस्थमा हो सकता है।

5  घर के अन्दर प्रदूषण से

  • घर में भींगा होने पर दीवारों पर मोल्ड (Molds) या फंगस लग जाने पर
  • घर में पालतू जानवर (कुत्ता, बिल्ली) के बाल, थूक और पेशाब से, ख़ास करके अगर कोई बच्चा उस जानवर से बहुत खेलता है
  • तिलचट्टा के खाल से (Cockroach), छोटे कीटाणु से (House Dust Mite)
  • खाने में कोई पदार्थ से जैसे की पैकेट में रखे खाने के साथ अन्य मिलावट जो की उस खाने को ख़राब होने से बचाता है
  • खाना से एलरजी से जैसे की दूध, अंडा, श्रिम्प मछली, मूंगफली
  • कोई दवा से, जैसे की सिरदर्द का दवा इबुप्रोफेन (Ibuprofen) या अस्पिरिन (Aspirin), संक्रमित बीमार के लिए पेनीसिल्लिन (Penicillin), दिल के रोग के लिए बीटा ब्लोकर (Beta Blocker)

6  बीमारी से

  • कोई नाक, कान, गला या सांस के नली के बीमारी से
  • खट्टा ढकार आने पर, पेट से आधा-पचा हुआ खाना गर्दन तक आ सकता है, और फेफड़ा में जा सकता है। यह भी आस्थमा का कारण हो सकता है। इसको गस्ट्रो-इसोफेजियल रिफल्क्स (Gastro-esophageal reflux disorder or GERD) कहते हैं।

7  होर्मोंस के बदलाव से

  • होर्मोंस के बदलाव से लड़की में आस्थमा हो सकता है, जैसे की मासिक धर्म के समय या गर्भ के दौरान|


आस्थमा के क्या लक्षण होते हैं?


आस्थमा के अनेक लक्षण होते हैं। इसमें से मरीज़ को कोई भी लक्षण हो सकता है। कुछ लक्षण जो कि बहुत लोगों में पाया जा सकता है, वो हैं -
  • दमा या हफनी होना, खास करके सांस छोडते वख्त
  • खांसी होना
  • सांस लेने में तकलीफ़
  • छाती में कफ जमा हुआ लगना
  • छाती जकडा हुआ लगना
  • फेफड़ा में संक्रमित बीमारी होना, जिसे न्युमोनिया (pneumonia) कहते हैं

3.  अपने बच्चे को डाक्टर के पास कब ले जाना चाहिये?

अगर आपके बच्चे को कभी भी नीचे लिखे हुये बातों में से कुछ भी हो रहा है, तो अपने डाक्टर के पास जरूर ले जायें।
  • अगर उसको सांस लेने में तकलीफ है
  • खांसी जो बहुत दिनों से है, और छूट नहीं रहा है
  • जब भी आपका बच्चा खेलता है तो उसको खांसी या दमा होता है
  • छाती पर बहुत अधिक बोझ लगता है
  • सांस छोडते समय आवाज़ या सीटी निकलता है

4.  अपने बच्चे को अस्पताल कब जाना चाहिये?

अगर आपके बच्चे को कभी भी नीचे लिखे हुये बातों में से कुछ भी हो रहा है, तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिये-
  • अगर उसको सांस लेने में बहुत तकलीफ है या सांस रुक रहा है
  • उसको बोलने में तकलीफ है
  • उसको सांस लेने के लिये नाक, गले, छाती और पेट के अन्य मांस-पेशियों का इस्तेमाल लेना हो।
  • वो मुरछित अवस्था में है या होनेवाला है
ध्यान रहे कि आस्थमा का अटैक बहुत मिनटों में किसी मरीज को गम्भीर रूप से बीमार कर सकता है। इलाज न मिलने पर, दमा का भयानक अटैक जानलेवा भी हो सकता है।

5.  आस्थमा के लक्षण से कैसा समझा जाता है कि कितना गम्भीर स्थिती है?

आस्थमा के लक्षण से आस्थ्मा को अनेक वर्ग में विभाजित किया जाता है। सभी को एक ही तरह का दमा नहीं होता है, और एक ही व्यक्ति में अलग-अलग समय में विभिन्न प्रकार के दमा के लक्षण देखने को मिल सकता है। फिर भी, डाक्टर जब आप से शुरू में कुछ सवाल पूछते हैं, तो उससे आपका आस्थमा को वर्गीकरण करने में मद्द मिलता है। कुछ वर्ग नीचे दिया गया है -
  • कम समय से आस्थ्मा है, जैसे कुछ दिन, हफ्ते या महीने
  • बहुत समय से आस्थ्मा है, बहुत महीने या सालों से है
  • बोलने में तकलीफ है, और आप एक-एक शब्द रुक-रुक कर बोल रहे हैं, तो अत्यंत गम्भीर आस्थ्मा है
  • बोलने में तकलीफ है, और आप एक-एक वाक्य रुक-रुक कर बोल रहे हैं, तो मध्यम गम्भीर आस्थ्मा है
  • बोलने में तकलीफ है, और आप सामन्य तरीके से बोल रहे हैं, तो हल्का आस्थ्मा है
  • सांस के तकलीफ से, हर हफ्ते आप दो-तीन रात ठीक से सो नहीं पाते हैं, तो अत्यंत गम्भीर आस्थ्मा है
  • सांस के तकलीफ से, हर महीने आप दो-तीन रात ठीक से सो नहीं पाते हैं, तो मध्यम गम्भीर आस्थ्मा है
इसके अलावा डाक्टर आपसे पूछ सकते हैं, कि आप उस समय क्या कर रहे थे, जिससे कि आपको आस्थमा हुआ। इससे किसी कारण का पता चल सकता है।

आस्थमा और व्यायाम (Asthma and exercise )


1.  क्या आस्थमा में सामान्य तरह से व्यायाम कर सकते हैं?

अस्थमा होने का यह मतलब नहीं है कि आप पर कोई प्रतिबंध लगा है। आप सामान्य तरह से व्यायाम कर सकते हैं। बच्चे, सामान्य रूप से खेल-कूद सकते हैं। इससे आपका शरीर तंदरुस्त रहेगा। लेकिन, आपको पहले कुछ बातों का ध्यान रखना पड़ेगा, जिसका जिक्र नीचे दिया गया है।

2.  कब सामान्य रूप से व्यायाम कर सकते हैं?

अगर आपका आस्थमा नियंत्रित है, तो आप सामान्य रूप से व्यायाम कर सकते हैं।
अगर व्यायाम के दौरान, अगर आपको कोई भी निम्नलिखित परेशानी हो, तो आपका आस्थमा नियंत्रण में नहीं है। उदाहरण के लिये – सांस लेने में और खास करके छोड़ने में तकलीफ होना, सांस लेते समय और छोड़ते समय सीटी बजना, जिसे व्हीज़ींग (wheezing) कहते हैं, खांसी, गाढ़ा बलगम, छाती पर भारीपन और छाती कसा होना।

3.  व्यायाम या खेल-कूद के समय क्या ध्यान रखना चाहिये?

  • कभी अकेले में कोई भी व्यायाम न करें
  • व्यायाम करने के 10 मिनट पहले अपना दवा लें
  • व्यायाम को धीरे-धीरे बढ़ायें, अर्थात पहले हल्का-फुल्का चलें या अन्य हल्का कसरत करें
  • हमेशा अपना दवा साथ में रखें, जिससे आपको तुरंत राहत पहुंचता है
  • आस्थमा के अन्य कारणों से अपना बचाव करें। उदाहरण के लिये – ठंडा हवा, फूल से पराग, धूल, बुरादा, प्रदुषण, धुंआ और अन्य
  • अंत में व्यायाम को धीरे-धीरे घटायें, अर्थात हल्का-फुल्का चलें या अन्य हल्का कसरत करें


 मिटरड डोज़ इनहेलर (Metered dose inhaler)


1.  मिटरड डोज़ इनहेलर क्या होता है?

मिटरड डोज़ इनहेलर, फेफड़ा में दवा लेने के लिये, एक तरह का यंत्र होता है। इसमें एक दवा का डिब्बा (Canister) को प्लास्टिक के खोल (plastic case) में रखा होता है, और एक माउथपीस (mouth-piece) होता है। यह माउथपीस को मुंह से लगाया जाता है। इस दवा का सबसे अधिक लाभ यह है कि अधिक से अधिक दवा, फेफड़ा तक पहुंच सकता है और बांकि शरीर पर दवा से कोई खास नुकसान नहीं पहुंचता है

3.  आस्थमा दवा का मिटरड डोज़ इनहेलर कैसे लें?

मिटरड डोज़ इनहेलर (Metered Dose Inhaler), फेफड़ा में दवा देने का एक तरीका है। इसको एम डी आई (MDI) भी कहते हैं। यह एक बहुचर्चित तरीका है, जो डाक्टर अपने आस्थमा के मरीज़ को देते हैं। इस दवा का सबसे अधिक लाभ यह है कि अधिक से अधिक दवा, फेफड़ा तक पहुंच सकता है और बांकि शरीर पर दवा से कोई खास नुकसान नहीं पहुंचता है। लेकिन इस दवा को लेने में एक रुकावट है, और वह है कि इस दवा को सही तरह से लेना आना चाहिये, अन्यथा सारा दवा मुंह में ही रह जाता है, और बहुत कम दवा फेफड़ा तक पहुंचता है। यहां हम इस दवा को सही तरह से लेने के विधी पर बात करेंगे।
मिटरड डोज़ इनहेलर (Metered Dose Inhaler) को सही तरह से लेने का विधी नीचे दिया गया है -
  • दवा पर से ढक्कन (plastic cap) हटायें|
  • दवा के डिब्बे को सही तरह से पकड़ें, जिससे कि दवा का माउथपीस मरीज़ के मुंह के 1 इंच या दो उंगली आगे हो।
  • मरीज का सिर हल्के तरीके से उठा होना चाहिये, और मुंह खुला होना चहिये।
  • दवा को कुछ समय तक हिलायें; इससे दवा अच्छे तरह से मिल जाते हैं।
  • एक बार गहरा सांस लेकर, आराम से सांस छोड़ें
  • दवा को मुंह से लगायें, और अपने होंठ से उसे जकड़ लें
  • सांस लेना चालू करें, और साथ ही दवा के डिब्बा (Canister) को नीचे के तरफ दबायें
  • सांस पूरे तरह से लें, और फिर कम से कम 10 सेकंड तक सांस रोक कर रखें, जिससे कि दवा के कण आपके फेफड़ा तक पहुंच कर अच्छे से फैल सकें।
  • फिर आहिस्ते से सांस बाहर छोड़ें
  • सामान्य रूप से सांस लेना चालू करें
  • अगर जरूरत हो उपर दिये गये क्रम को फिर से दोहरायें
  • बाद में एक बार कुल्ला कर लें, जिससे कि मुंह में कोई दवा न रहे
  • अगर ठीक तरह से दवा लिया गया है, तो तुरंत फेफड़ा तक आपको अच्छा महसूस होगा और सांस लेने में आसानी मिलेगा। अगर कोई फर्क नहीं पड़ा तो फिर से ध्यान दें कि क्या आप सही तरह से दवा ले रहे हैं कि नहीं?
  • डाक्टर के अनुसार बताये गये दवा को ही, निश्चित समय पर, एक या दो बार लेना चाहिये। यह कभी न करें कि जब जी चाहे, एक बार दवा ले लिया। अगर आपको बताये गये नुस्खे से अधिक बार दवा लेने का जरूरत पड रहा है तो फिर से अपने डाक्टर से परामर्श लें।
  • हफ्ता में एक बार दवा के प्लास्टिक डिब्बा (plastic case) और उसके ढक्कन (plastic cap) को पानी से धोना चाहिये।

4.  एक मिटरड डोज़ इनहेलर कितना दिन चलता है?

किसी मिटरड डोज़ इनहेलर को आप कितने बार इस्तेमाल करते हैं, इस पर निर्भर करता है कि वो दवा का डिब्बा आपको कितने दिन तक चलेगा। उदाहरण के लिये, अगर आप कोई दवा लेते हैं, जिसपर लिखा हुआ है कि वो डिब्बा में 200 बार दवा देने का क्षमता है, और आप उस दवा को दिन में 2 बार सुबह और 2 बार संध्या में रोज़ाना लेते हैं, तो यह डिब्बा आपको 200/4 = 50 दिन चलेगा। आप यह बात अपने डिब्बा के उपर और डायरी में लिख लें कि यह दवा का डिब्बा कब शूरु किया गया और अंदाज़ से किस तिथी को यह दवा का डिब्बा खत्म होगा। साथ ही यह देख कर रखें कि कहीं यह दवा काफ़ी पुराना तो नहीं है, या एक्सपायर्ड (expired) तो नहीं है। तो अगर आपका दवा खत्म होनेवाला है या फिर पुराना है, तो नया दवा बाज़ार से ले आयें।
जिन लोग को आस्थमा है, उन्हें अपने पास हमेशा अपना डिब्बा रखना चाहिये, चाहे घर पर, स्कूल में, दफ्तर में, किसी वाहन में या सफर पर। जरूरत पड़ने पर यह दवा मरीज़ के लिये अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

5.  ये इन्हेलर को किन दवाओं को लेने के लिये इस्तेमाल किया जाता है?

इन्हेलर से अनेक प्रकार के दवा को फेफड़ा में पहुंचाने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कि
  • विभिन्न प्रकार के आस्थमा के दवा
  • धूम्रपान के आदत को छुड़ाने के लिये निकोटीन(nicotine) दवा के लिये